वैज्ञानिक अनुसंधान, नियमित निगरानी और समन्वित प्रयासों से संरक्षण रणनीति को मिलेगी मजबूती
प्रोजेक्ट रैप्टर के उद्देश्यों और संरक्षण की प्राथमिकताओं पर हुआ मंथन
जयपुर। राजस्थान में गिद्धों एवं अन्य शिकारी पक्षियों के संरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए राजस्थान वन विभाग एवं भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के संयुक्त तत्वावधान में ‘प्रोजेक्ट रैप्टर’ पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। राजस्थान वन विभाग की मेजबानी में आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ वन अधिकारियों, वन्यजीव विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं एवं संरक्षण संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दौरान परियोजना के उद्देश्यों, प्रस्तावित गतिविधियों और राज्य में शिकारी पक्षियों के संरक्षण की प्रमुख प्राथमिकताओं पर चर्चा की गई।
वैज्ञानिक अध्ययन से पक्षियों की आबादी, आवागमन और आवास संबंधी जानकारी होगी सुदृढ़
कार्यक्रम में प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरिजीत बनर्जी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के.सी.ए. अरुण प्रसाद, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (प्रशासन) पवन कुमार उपाध्याय, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (योजना) अनुराग भारद्वाज सहित वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथियों एवं सभी प्रतिभाओं को मुख्य वन संरक्षक के आर अनुप ने धन्यवाद ज्ञापित कर आभार व्यक्त किया। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक-सी डॉ. आर. सुरेश कुमार एवं उनकी टीम ने परियोजना के उद्देश्यों, प्रस्तावित गतिविधियों और अपेक्षित परिणामों की जानकारी दी।
विशेषज्ञों ने गिद्ध संरक्षण की चुनौतियों और प्रभावी निगरानी पर रखे विचार
कार्यक्रम में विशेष अतिथि डॉ. क्रिस बोडेन ने गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में अपने अनुभव एवं विशेषज्ञता साझा की। उन्होंने गिद्धों की आबादी के समक्ष मौजूद खतरों की पहचान, नियमित निगरानी तंत्र को मजबूत बनाने और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर लक्षित संरक्षण उपाय विकसित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर राज्य वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के सदस्य श्री राजपाल सिंह तथा WWF-India और टाइगर वॉच के प्रतिनिधि धर्मेंद्र खंडाल सहित विभिन्न संरक्षण संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी सहभागिता की।
समन्वित प्रयासों से दीर्घकालीन संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा
प्रोजेक्ट रैप्टर के माध्यम से राजस्थान में गिद्धों एवं अन्य शिकारी पक्षियों की स्थिति, वितरण, आवागमन के स्वरूप, आबादियों के बीच संपर्क तथा उनके समक्ष मौजूद प्रमुख चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलने की उम्मीद है। परियोजना के अंतर्गत खतरों की पहचान करने और उनके समाधान के लिए संबंधित विभागों एवं हितधारकों के बीच सहयोग को मजबूत बनाने पर भी ध्यान दिया जाएगा। कार्यक्रम में यह महत्वपूर्ण माना गया कि वैज्ञानिक अनुसंधान, मैदानी स्तर पर नियमित निगरानी और विभागीय समन्वय को एकीकृत कर संरक्षण के प्रभावी उपाय विकसित किए जाएं।
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