लेपर्ड रेस्क्यू से लेकर अनाथ शावकों की ‘मां’ बने जयपुर के जांबाज डॉक्टर
जयपुर। आज दुनिया भर में World Veterinary Day मनाया जा रहा है। एक ऐसा दिन जो उन पशु चिकित्सकों को समर्पित है, जो बेजुबान जीवों के दर्द को समझकर उन्हें नया जीवन देते हैं। इस खास मौके पर बात करते हैं Nahargarh Biological Park के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. अरविन्द माथुर की, जिनका जीवन वन्यजीव संरक्षण के लिए समर्पित है।
डॉ. माथुर ने अपने करियर में सैकड़ों वन्यजीवों को मौत के मुंह से बचाया है। उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें राज्य स्तरीय सम्मान के साथ-साथ 20 से अधिक प्रशस्ति पत्र और मेडल मिल चुके हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में 14 जिलों में 82 लेपर्ड का सफल रेस्क्यू शामिल है, जिसके चलते उनका नाम लिम्का और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। कई बार उन्होंने घनी आबादी और उग्र भीड़ के बीच बेहद जोखिम भरे हालात में लेपर्ड को ट्रेंकुलाइज किया।
एक ऑपरेशन के दौरान लेपर्ड के हमले में वे गंभीर रूप से घायल भी हुए, लेकिन स्वस्थ होते ही फिर उसी जुनून के साथ ड्यूटी पर लौट आए। सिर्फ लेपर्ड ही नहीं, डॉ. माथुर ने Ranthambore National Park, Sariska Tiger Reserve, मुकुंदरा और रामगढ़ जैसे क्षेत्रों में 40 से अधिक बाघों का ट्रेंकुलाइज, उपचार और रेडियो कॉलरिंग सफलतापूर्वक की है।

उनकी विशेषज्ञता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अब तक 50 से ज्यादा बाघ, शेर और लेपर्ड की जटिल सर्जरी कर चुके हैं। यूके, साउथ अफ्रीका और वनतारा में आधुनिक वन्यजीव चिकित्सा का प्रशिक्षण लेकर उन्होंने अपने कौशल को और निखारा है। डॉ. माथुर सिर्फ डॉक्टर ही नहीं, बल्कि अनाथ शावकों के लिए ‘मां’ भी बन चुके हैं। उन्होंने 5 बाघ, 4 लेपर्ड और 1 शेर के नवजात शावकों को अपनी देखरेख में पालकर नया जीवन दिया।
वे अभी दो बाघ शावकों की नियोनेटल केयर यूनिट में देखभाल कर रहे हैं, जिन्हें बोतल से दूध पिलाया जा रहा है। डॉ. अरविन्द माथुर का समर्पण यह साबित करता है कि अगर जुनून और सेवा का भाव हो, तो इंसान बेजुबानों की जिंदगी में भी उम्मीद की नई रोशनी जगा सकता है।
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