सुबह-सुबह मंत्री सुरेश रावत के घर में घुसा तेंदुआ, 10 घरों तक रहा मूवमेंट
भीड़ बेकाबू, पुलिस को बुलाना पड़ा, IFS चीफ शिखा मेहरा ने खुद संभाला मोर्चा
7 किलोमीटर दूर झालाना से सिविल लाइन्स तक कैसे पहुंचा तेंदुआ? उठे बड़े सवाल, एआई के दौर में डंडों से रेस्क्यू
दो महीने में 5वीं बार शहर में तेंदुए की एंट्री, मॉनिटरिंग पर सवाल
जयपुर। राजधानी जयपुर के VVIP सिविल लाइन्स इलाके में गुरुवार सुबह उस समय अफरा-तफरी मच गई जब एक तेंदुआ जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत के सरकारी बंगले में घुस आया। आमतौर पर शांत रहने वाले सिविल लाइन्स में अचानक हुई इस घटना से पूरे इलाके में दहशत फैल गई। करीब दो घंटे तक तेंदुआ मंत्री के घर और आसपास के मकानों में घूमता रहा, जबकि लोग खिड़कियों और छतों से स्थिति देखने को मजबूर रहे।
सूचना मिलते ही वन विभाग का पूरा सिस्टम एक्टिव हो गया। चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन IFS शिखा मेहरा खुद मौके पर पहुंचीं, जबकि रेंजर जितेंद्र सिंह शेखावत, नाहरगढ जैविक उद्यान के डॉ अरविंद माथुर, जयपुर चिड़ियाघर के डॉ अशोक तंवर और रेस्क्यू टीम ने तीन घंटे तक लगातार ऑपरेशन चलाया। तेंदुआ एक मकान से दूसरे मकान में छलांग लगाता रहा, जिससे रेस्क्यू मुश्किल होता गया। भीड़ बढ़ने पर पुलिस को बुलाकर माहौल नियंत्रित करना पड़ा।

करीब 3 घंटे की जद्दोजहद के बाद हरि मार्ग स्थित एक घर से डॉ अरविंद माथुर, डॉ अशोक तंवर और रेंजर जितेंद्र सिंह ने तेंदुए को ट्रेंकुलाइज कर सुरक्षित पकड़ा। पकड़े जाने के बाद उसका मेडिकल कराया जा रहा है, जिसके बाद वन विभाग तय करेगा कि उसे कहां छोड़ा जाएगा।
इसी दौरान बड़ा सवाल उठा कि आखिर तेंदुआ झालाना से 7 किलोमीटर दूर सिविल लाइन्स कैसे पहुंच गया? वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स के अनुसार, इतनी लंबी दूरी ट्रैफिक भरे रिहायशी क्षेत्र में तय करना आसान नहीं। पकड़े गए मेल तेंदुए की उम्र 2–3 साल और वजन 50–55 किलो बताया जा रहा है।
इस घटना ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एआई के दौर में अभी भी डंडों के सहारे रेस्क्यू करना, विशेषज्ञों के अनुसार, समय के साथ चलने वाली व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। ड्रोन और स्मार्ट ट्रैकिंग का उपयोग इस तरह के ऑपरेशन को काफी आसान बना सकता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि दो महीनों में यह पांचवीं बार है जब तेंदुआ जयपुर के आबादी क्षेत्र में घुसा है। गोपालपुरा, दुर्गापुरा, गुर्जर घाटी के बाद अब सिविल लाइन्स जैसे हाई-प्रोफाइल इलाके तक पहुंचना गंभीर चिंता का विषय है।
अब सवाल यही है कि क्या वन विभाग शहर में बढ़ते लेपर्ड मूवमेंट को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाएगा? और क्या जंगली इलाकों में भोजन की कमी या शहरीकरण इसका कारण है? समाधान खोजने में देरी हुई तो ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो सकता है।
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