छऊ, थय्यम और कांगड़ा नृत्य ने बांधा समां

लोकरंग के दसवें दिन लोक संस्कृति के रंगों में डूबा जबाहर कला केंद्र

जयपुर। जवाहर कला केंद्र में चल रहे 28वें लोकरंग महोत्सव के दसवें दिन मंच लोक संस्कृति की विविधता और रंगीन परंपराओं से सराबोर हो गया। देश के विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने अपने पारंपरिक नृत्यों और गीतों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

शाम की शुरुआत शेर मोहम्मद, निहाल खान और जलाल खान के लोक गीतों से हुई। बच्चों के लोक गायन के बाद सारंगी, खड़ताल, भपंग और मोरचंग की जुगलबंदी ने माहौल को रोमांचित कर दिया। कविता सक्सैना व समूह ने “माखन चोरी ब्रज नृत्य” के माध्यम से श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को जीवंत कर दिया।

इसके बाद छत्तीसगढ़ के मांदरी नृत्य, मध्यप्रदेश के कांगड़ा नृत्य और राजस्थान के घूमर नृत्य ने दर्शकों को लोक संस्कृति की सुंदरता से रूबरू कराया। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी कलाकाराओं की घूम ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

केरल के कलाकारों ने थय्यम नृत्य के जरिए देवी-देवताओं की आराधना और लोककथाओं का मंचन किया, जबकि जम्मू-कश्मीर के डोगरी नृत्य ने ऊर्जावान लय से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। झारखंड के सुधीर एवं समूह ने ‘छऊ नृत्य’ में महिषासुर वध की कहानी प्रस्तुत कर देवी शक्ति की भावनाओं को जीवंत किया।

शाम की अंतिम प्रस्तुति में गुजरात के भरूच रतनपुर से आए कलाकारों ने सिद्दी धमाल नृत्य के माध्यम से बाबा गोर की वंदना की। अफ्रीकी आदिवासी शैली में हुए इस नृत्य ने उत्सव को चरम पर पहुंचा दिया।

महोत्सव का भव्य समापन 17 अक्टूबर को सिम्फनी प्रस्तुति के साथ होगा, जिसमें देश के 25 राज्यों से आए 50 वाद्य यंत्रों की संगति में दीपमाला और लोक यात्रा के साथ सांस्कृतिक समापन किया जाएगा।

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